महात्मा गांधी की इस सच्चाई को देखकर आप रह जाएंगे हैरान

वैसे तो हम सब जानते है कि, नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की थी, लेकिन इसके पीछे का राज खुद नाथूराम गोडसे ने बताया है आइए जानते है कि महात्मा गांधी कि हत्या के बाद नाथूराम क्या बोलते है। दरअसल, गिरफ़्तार होने के बाद गोडसे ने गांधी के पुत्र देवदास गांधी (राजमोहन गांधी के पिता) को तब पहचान लिया था और जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुंचे  तो इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया। 

आप सभी को बता दें कि, नाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, “मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं। हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक। मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). नाथूराम कहते है कि आज तुमने अपने पिता को खोया है।  मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है। तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है, कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव.”इसके बाद देवदास ने नाथूराम से पूछा  तो फिर तुमने ऐसा क्यों किया?”  
और नाथूराम ने जवाब में सीधा सीधा कहा,

“केवल और केवल राजनीतिक वजह से.”नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया। अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी। गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक में लिखते है कि, “अगर सरकार अदालत में दिए मेरे बयान पर से पाबंदी हटा लेती है, ऐसा जब भी हो, मैं तुम्हें उसे प्रकाशित करने के लिए अधिकृत करता हूं.

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“नाथूराम कहते है कि मेरा पहला कर्तव्य हिंदुत्व कि रक्षा करना नहीं था बल्कि देश की रक्षा करना ही मेरा परम धर्म था। जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है.”

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दरअसल, गांधी की हत्या से जुड़े हर पहलू को नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अनावश्यक रूप से रहस्यमय बना दिया। देश के लोग आज तक ढेर सारे बिंदुओं से अनजान है। गांधी की हत्या क़रीब सात दशक से पहेली बनी हुई है। यहां तक कि गांधी के जीवन के निगेटिव पहलुओं को उकेरते हुए जितनी भी किताबें छपती थीं, सब पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया जाता था, जिससे बाद में लेखक-प्रकाशक कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते थे और कोर्ट के आदेश के बाद वह प्रतिबंध हटता था।

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